भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद
केन्द्रीय समुद्री मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान
  • Pelagic seabird flesh-footed shearwaterPuffinus carneipes
  • Hydrographic sampling on board FRV Silver Pompano
  • Studies on PFZ validation
  • Mangrove nursey at Moothakunnam for restoring habitats
  • Carbondioxide Dispenser and Recorder for Climate change studies

Home मात्स्यिकी पर्यावरण

मात्स्यिकी पर्यावरण प्रभाग

अनुसंधान के महत्वपूर्ण क्षेत्र

पर्यावरण एवं मात्स्यिकी, पी एफ इजेड मान्‍यकरण, पारिस्थितिकीय- जीवविज्ञानीय माडलिंग

पारिस्थितिक सेवाओं एवं प्रक्रियाओं, समुद्री कचरा और अन्य मानवीय संघातों का मूल्यांकन

मैंग्रोवों के लिए पुनःस्थापना नयाचारों का  विकास, जागरूकता कार्यक्रम

समुद्री शैवालों, समुद्री घास आवास, प्लावक, समुद्री स्तनियों, तटीय एवं वेलापवर्ती पक्षियों पर प्रमुखता

जलवायु परिवर्तन – कार्बन पृथक्करण, महासागर अम्लीकरण, समाज पर आधारित कार्यक्रमों पर प्रमुखता

 चालू अनुसंधान परियोजनाएं

तटीय एवं समुद्री परिस्थिति में प्रदूषण एवं कचरा और इसका प्रभाव  (FISHCMFRISIL201201900019)

संकटपूर्ण समुद्री आवासतंत्रों की पारिस्थितिक प्रक्रियाएं और पुनःस्‍थापना के लिए नयाचारों का विकास (FISHCMFRISIL201201800018)

महाराष्ट्र की टिकाऊ समुद्री मात्स्यिकी के लिए मात्स्यिकी प्रबंधन योजनाओं का विकास (FISHCMFRISIL201201000010)

भारतीय तट के समुद्री शैवालों के संपदा निर्धारण, विदोहन एवं उपयोगिता

क. प्रायोजित परियोजनाएं

भारत के प्रमुख समुद्री मछली प्रभवों की मात्स्यिकी में प्रवेश की सफलता के पूर्वानुमान के लिए माडलों को विकसित करना

केरल और लक्षद्वीप की प्रमुख वेलापवर्ती  मछलियों पर परिस्थिति- जैविक अन्वेषण एवं एपीपेलाजिक आवास का परिस्थिति- जैविक माडलिंग 

सुभेध्य क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन के अनुसार अनुकूलन क्षमता बढाने की कार्यविधियां – विश्‍व बैंक – जी ई एफ

भारत के पश्चिम तट पर वाणिज्यिक प्रमुख समुद्री शैवालों की विविधता की स्थिति

मन्नार खाडी की जीव संपदाएं: जागरूकता बढाने और परिरक्षण नीति रूपायन के लिए प्रमुख प्रजातियों एवं आवासों का निर्धारण

ख. परामर्श परियोजनाएं

मुंबई मलजल निपटान परियोजना (एम एस डी पी) के लिए समुद्री मुहाने में सहमति बनान एवं पर्यावरणीय अध्ययन (एस एस डी पी) स्‍तर II

मुंबई के महुल गाँव के टी पी एल ट्रोम्बे में प्रस्तावित परियोजना के लिए बार्जिंग परिचालन का आधारभूत समुद्री पारिस्थितिक अध्ययन एवं संघात निर्धारण

आंध्रा प्रदेश के विशाखपट्टणम के चुने गए स्‍थानों में कृत्रिम भित्ती की स्थापना

पूरी की गयी अनुसंधान परियोजनाएं

क. गृहांदर परियोजनाएं

तटीय समुद्री पर्यावरण एवं मात्स्यिकी पर मानवीय गतिविधियों का संघात (FEM/01

भारतीय तट पर छोटे वेलापवार्तियों के वितरण के बदलाव पर पर्यावरणीय परिवर्तन के संघात एवं मछली प्राप्ति पर अध्ययन (FEM/02)

संकटपूर्ण समुद्री आवासों के लिए मात्स्यिकी पारितंत्र की पुनःस्‍थापना योजनाओं का विकास (FEM/RE/03)

ख. प्रायोजित परियोजनाएं

जलवायु परिवर्तन के प्रति भारतीय समुद्री मात्स्यिकी का संघात, अनुकूलन एवं सुभोद्यता – स्‍तर- II 

केरल तट पर विविध प्रकार के मत्स्यन संचालनों / लक्षित प्रजातियों के लिए व्‍युत्पन्न लाभों की तुलना करने हेतु  आइ एन सी ओ आइ एस द्वारा निकाले गए पी एफ इजेड परामर्शों का मान्यकरण

भारतीय अनन्य आर्थिक मेखला और समीपस्थ समुद्रों की समुद्री स्तनियों पर अध्ययन

ग. परामर्श परियोजनाएं

मुंबई मलजल निपटान परियोजना (एम एस डी पी) के लिए समुद्री मुहाने में सहमति बनान एवं पर्यावरणीय अध्ययन (एस एस डी पी) स्‍तर II

कूड़मकुलम परमाणु ऊर्जा प्लांट के लिए समुद्री ई आइ ए अध्‍ययन

प्रौद्योगिकियॉं/ अवधारणाएं/ जांच-परिणाम

मात्स्यिकी और पर्यावरण

  • पर्यावरणीय प्राचलों और तारलियों की पकड़ के बीच के सहसंबंधः वर्ष 1926–1956 और 1993-1998 के दौरान सी यु एस (गहन उत्‍स्रवण के संकेत के साथ) की सकारात्‍मक विसंगतियों के परिणामस्‍वरूप तारलियों की पकड़ कम हुई.
  • वर्ष 1957–1992 और 1999-2005 के दौरान सी यु एस (हल्‍के उत्‍स्रवण के संकेत के साथ) की नकारात्‍मक विसंगतियों के परिणामस्‍वरूप तारलियों की पकड़ में वृद्धि हुई.
  • मछुआरों को स्‍थानीय भाषा में पी एफ इजेड सलाह देने के लिए mKrishi सेवा विकसित की गयी.
  • पी एफ इज़ेड परामर्शों के विश्‍लेषण से यह संकेत मिलता है कि केरल के अरब सागर के 50 मी. से कम गहराई युक्‍त तटीय क्षेत्र मध्‍य महाद्वीपीय शेल्‍फ क्षेत्र और महाद्वीपीय ढालू की अपेक्षा पी एफ इज़ेड परामर्शी मानचित्रों में हुआ है.
  • एन आइ ओ के सहयोग से केरल के मडबैंकों पर अध्‍ययन का प्रारंभ किया गया. लक्षित समुद्री परिभ्रमण द्वारा संपदाओं, वेलापवर्ती पक्षियों, सरीसृपों और प्‍लवकों पर उल्‍लेखनीय आकलन किया गया.
  • देश में ही पहली बार भारतीय तट की तारलियों और बांगडों के ओटोलिथों का Sr/Ca अनुपात पर डाटाबेस विकसित किया गया. Sr/Ca अनुपात से तारलियों में उल्‍लेखनीय स्‍थानिक परिवर्तनशीलता और बांगडों में कालिक परिवर्तनशीलता देखी गयी.

मानवीय संघात

  • लगातार निगरानी से यह संकेत मिला कि सामान्‍य वाणिज्यिक वेलापवर्ती, तलमज्‍जी, मोलस्‍क और क्रस्‍टेशियन संपदाएं मेर्क्‍युरी प्रदूषण से मुक्‍त है.
  • भारत के पश्चिम और पूर्व तटों के तीन केन्‍द्रों से, समुद्री खाद्य में भारी धातुओं पर समय श्रेणी डाटाबेस विकसित किया गया.
  • भारत के पश्चिम और पूर्व तटों के चुने गए स्‍थानों के अवसाद में भारी धातुओं (Hg, As, Cu, Zn, Pb, Cd, Ni और Mn) पर डाटाबेस विकसित किया गया.
  • भारत के पश्चिम और पूर्व तटों के चुने गए स्‍थानों के पानी में भारी धातुओं (Hg और As) पर डाटाबेस विकसित किया गया.
  • UNEP मानदंडों के आधार पर विभिन्‍न समुद्रवर्ती राज्‍यों के समुद्री मलबे / कूड़े का वर्गीकरण किया गया.
  • पानी में फैले गए कूड़े के आधार पर, तीन स्‍तरों में (प्‍लवमान, खंड, जलमग्‍न) तटीय आवास व्‍यवस्‍था की वर्गीकरण प्रणाली विकसित की गयी.
  • USEPA के मार्गनिर्देशों के आधार पर विभिन्‍न समुद्रवर्ती राज्‍यों के चुने गए तटीय क्षेत्रों के लिए समुद्र जल गुणता सूचक (SWQI) का आकलन किया गया.
  • पेलाजिकों के आंत्र में 5 मि. मी. से कम और 5 से 10 मि. मी. के माइक्रो प्‍लास्टिक पाए गए.
  • पश्चिम तट के तटीय और महासमुद्रों में गोस्‍ट नेट पाए गए.

आवास

  • मिनिकोय द्वीपसमूह के भूमिगत भागों (राइज़ोम और जड़) के औसत जैवभार का गीला भार 500 g m-2 था, जो शाकाहारी हरे कच्‍छपों की वजह से पत्‍तों का भार 96 g m-2 तक घट गया.
  • मध्‍य केरल के लिए सामुदायिक आधार पर सहभागिता अभिगम द्वारा मैंग्रोवों, विशेषतः राइज़ोफोरा मुक्रोनेटा के लिए पुनःस्‍थापता का नयाचार विकसित किया गया.
  • पाक उपसागर में किए गए जलांदर सर्वेक्षण से तीन प्रकार के समुद्री घास संस्‍तर प्रकट हुए (i) मंडपम क्षेत्र में पाए जाने के समान प्रवालों से जुड़े हुए समुद्री घास संस्‍तर (ii) अदिरमपट्टिणम, मल्लिपट्टिणम और सेतुमावाचत्रमारिया में पाए जाने के समान मैंग्रोव से जुड़े हुए समुद्री घास संस्‍तर और (iii) तोन्‍डी, कोट्टैपट्टिणम और जगतापट्टिणम उथले रेतीले नितलस्‍थ समुद्री घास संस्‍तर.

समुद्री स्‍तनियॉं और समुद्री पक्षी

  • समुद्री स्‍तनियों की सात प्रजातियों, जिनमें 11 पखरहित पोरपाइस, स्पिन्‍नर डोलफिन, बोटिलनोस डोलफिन, इन्‍डो-पसफिक हम्‍पबैक्‍ड डोलफिन, रिस्‍सो डोलफिन, ट्रोपिकल स्‍पोटड डोलफिन और लोंग बीक्‍ड सामान्‍य डोलफिन सम्मिलित हैं, के उदर की समाग्रियों की जांच करने पर व्‍यक्‍त हुआ कि सीटेशियन मुख्‍यतया विस्‍तृत परास के पौष्टिक स्‍तर के टेलियोस्‍ट्स खाते हैं.
  • उपस्थिति की बांरंबरता, संख्‍या की प्रतिशतता और भार के सूचक के आधार पर समु्द्री स्तनियों का मुख्‍य आहार तारली (सारडिनेल्‍ला लोंगिसेप्‍स) पहचाना गया है.
  • नमूना संग्रहण के छः स्‍थानों से संग्रहित आकस्मिक पकड़ और धंसन हुई 33 समुद्री स्‍तनियों के पेशी, जिगर और वृक्‍क के नमूनों से देखा गया कि दुनिया के अन्‍य भागों के नमूनों की अपेक्षा इन स्‍थानों के नमूनों में ट्रेस मेटल की सांद्रता कम थी.
  • ओर्गनोक्‍लोरिन कीटनाशकों की जांच करने हेतु समुद्री स्तनियों की आठ प्रजातियों के 37 नमूनों से ब्‍लबर का विश्‍लेषण किया गया. विश्‍व के अन्‍य भागों के नमूनों से प्राप्‍त सूचकों की अपेक्षा ΣHCHs (BHCs), ΣDDTs और क्‍लोरडेन की सांद्रता सामान्‍यतः कम थी.
  • पाक खाड़ी के समुद्री घास संस्‍तरों में सितंबर 2013 के दौरान ड्यूगोंग का निशान देखा गया.

जलवायु परिवर्तन

  • यह आकलन किया गया कि भारत के तट का समुद्री शैवाल जैवभार, 365 t CO2 /d कार्बन उत्‍सर्जन के प्रति 9052 t CO2/d कार्बन उपयुक्‍त करने के लिए सक्षम है और इससे यह संकेत मिलता है कि सकल कार्बन क्रेडिट 8687 t/d है.
  • लक्षित पारिस्थितिक आकलनों और प्रयोगशाला पर आधारित परीक्षणों के परिणामों से यह व्‍यक्‍त हुआ कि शुक्ति के मेरोप्‍लांक्‍टोनिक स्‍तर के दौरान pH का स्‍त 7.0 से कम हो गया तो नई शुक्तियों के प्रवेश पर इसका असर पड जाएगा और इस कारण से उष्‍णकटिबंधीय नदीमुखों में अम्‍लीकरण की जांच करने के सूचक के रूप में शुक्ति स्‍पैटों की सांद्रता को उपयुक्‍त किया जा सकता है.
  • पश्चिम बंगाल के जिलाओं में सुभेद्यता सूचकांक का आकलन किया गया.
  • तीन प्रमुख झीलों, वेम्‍बनाड झील, चिल्‍का झील और पुलिकाट झील में एस एस टी के

परिवर्तनों और मौसमी परिवर्तनों का पर्यवेक्षण किया गया.

  • जलवायु परिवर्तन पर मछुआरों के अवगाह के स्‍तर से यह संकेत मिला कि सी सी के बारे में उनकी जानकारी कम है.
  • सर्वेक्षणों से मत्‍स्‍यन क्षेत्र, समुद्री सतह स्‍तर और बारंबार होनेवाली चरम घटनाओं के संबंध में तटीय गांवों के सी सी संघातों पर पता चला.

समुद्री संवर्धन

  • नियंत्रित स्थिति में समुद्री ककडि़यों के संतति उत्‍पादन की प्रौद्योगिकी विकसित की गयी.
  • समुद्री पिंजरा पालन का ई आइ ए किया गया.
  • खाद्य शुक्ति पालन का ई आइ ए किया गया और अवसाद पर संघात कम करने के लिए प्रबंधन सलाह का प्रस्‍ताव किया गया.
  • वाणिज्यिक प्रमुख समुद्री शैवालों के लिए पालन प्रणाली विकसित की गयी.
  • स्‍फुटनशालाओं में शैवाल खाद्य के स्‍टॉक संवर्धन और भारी संवर्धन के तकनीकों का मानकीकरण किया गया.

घटना कैलन्डनर

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